'चंद्र ग्रहण सी तू दिखती रोज नहीं 'पितृ के बाणे मैं लिप्त रोज कई चंदन के डाले सी पार तू जलती रोज नहीं राम जी की बन रोज दिवाली ज्योत जगा के सोव तू नीली छतरी आले की

 चंद्र ग्रहण सी तू चमके, पितृ के बाण में लिपटी रोज,

चंदन के डालों सी बस जल, नहीं थमती तू ज्योति को, राम जी की बान रोज बजते, दिवाली की रात सजती रोज, नीली छतरी की चादर में, जगाए तू नींद से सोवती।

हे नीली छतरी आले की, तू हर रोज चमकती रहे, जगमगाती रहे, निरंतर तू जलती रहे।

आसमान से तू उतरकर, पृथ्वी की गोद में सोवती, हर रोज नए सपने जोड़ती, मिट्टी को नई जीवन देती। तेरी छांव में हर व्यक्ति, धूप के तन को ताजगी पाता, तेरी शोभा से रंगीन हो, सबकी रोज़ की रातें खास।

हे नीली छतरी आले की, तू हर रोज चमकती रहे, जगमगाती रहे, निरंतर तू जलती रहे।

तेरी बरसी बादलों की छांव, सदैव हर मन को भाती, तेरे बिना ये जग सुना है, तेरी छांव में ही जीवन मिलता।

हे नीली छतरी आले की, तू हर रोज चमकती रहे, जगमगाती रहे, निरंतर तू जलती रहे।

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